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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यावत्तुर्यपरामर्शस्तावत्केवलतापदम् । जीवन्मुक्तस्य विषयो वचसां च रघूद्वह ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सत्तरवाँ सर्ग असंग सुख में परम शान्ति को प्राप्त कर रहा पुरुष व्यवहार से उत्पन्न दोषों से जिस प्रकार से दुःखी नहीं होता, उस प्रकार सयुक्तिक उपपादन । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र जो असंग से उत्पन्न सुख के निरन्तर आस्वाद में संलग्न हैं और जिनके अन्तःकरण अत्यन्त विशाल हैं, ऐसे जीवन्मुक्त महानुभाव, चाहे व्यवहार करें, तो भी सदा-सर्वदा निर्भय और शोक शून्य ही होकर अवस्थित रहते हैं