Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
अत ऊर्ध्वमदेहानां मुक्तानां वचसा तथा ।
विषयो न महाबाहो पुरुषाणामिवाम्बरम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
उनकी वैसी स्थिति होती है, यह आपने किस प्रमाण से जाना ? इस प्रश्न पर प्रमाण कहते हैं।
हे श्रीरामजी, यद्यपि पुत्र और धन का विनाश तथा बन्धन, मान, अपमान आदि क्षोभ के (घबड़ाहट
के) हेतुओं से साधारण लोगों को क्षुब्ध शरीर-सा मालूम पड़नेपर भी वास्तव में क्षुब्धशरीर से शून्य
जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञ महाविद्वान् की चित्त वृत्ति सदा-सर्वदा परमार्थ सुख में ही संलग्न रहती है। उससे
तनिक भी उसका वियोग नहीं होता, अतएव वह अन्दर से परिपूर्ण रहता है तथा उसके मुख में पूर्ण-
चन्द्रमा की नाई परम शोभा दीख पड़ती है, यही दीख पड़नेवाली पूर्णचन्द्र की शोभा ही तत्त्वज्ञ की
पूर्वोक्त अवस्था मे प्रमाण हे । चन्द्रपक्ष में ज्योतिश्चक्र ओर रथादि की गति से क्षुब्ध शरीर से शून्य पूर्ण
चन्द्र पूर्णिमा की रात्रि में संमुख होने से सूर्य की विषमता न होने के कारण भीतर अमृत से परिपूर्ण रहता
हे । उसके वदन सदुश बिम्ब में उत्तम शोभा दीख पड़ती है