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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

सिद्धे द्वित्वेऽपि देहस्य न संबन्धस्य संभवः । द्वित्वासिद्धौ तु सुमते कलनैवेदृशी कुतः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञो को सदा सर्वदा ही तुरीयावस्था होती है, यही कहना युक्तिसंगत हो सकता है, परन्तु यह कहना युक्तिसंगत नहीं हो सकता कि तत्त्वज्ञो को सुषुप्ति में ही वह तुर्य स्थिति होती है, इस प्रकार की आंशका को मन में रखकर कहते हैं। हे श्रीरामजी, यही सुषुप्ति-स्थिति अभ्यास योग से जब दृढता को प्राप्त हो जाती है, तब तत्त्वज्ञ महात्माओं के द्वारा तुर्य स्थिति कही जाती है अतः उक्त शंका का अवसर नहीं हो सकता