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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

इत्येतदेव तत्सत्त्वे तत्रैवान्तःस्थितिं कुरु । न बन्धोऽस्ति न मोक्षोऽस्ति कदाचित्कस्यचित्क्वचित् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

तब सुषुप्ति स्थिति कहने का अभिप्राय क्या है ? इस प्रश्न पर वैसा कहनेका अभिप्राय कहते हैं। सुषुप्ति अवस्था में आनन्दमय प्रत्यागात्मा में अशेष दुःखो का अभाव तथा निरतिशय सुख की परिपूर्णता रहती है, अतः तत्त्वज्ञ को दुःख शून्य निरतिशय सुख समृद्धि है, इसे विस्पष्ट रूप से बतलाने के लिए सुषुप्ति स्थिति का निर्देश किया गया है । इस निर्विकार सुषुप्ति स्थिति में तत्त्वज्ञ भीतर से निरतिशयानन्द से ही परिपूर्णं रहता है, उसके समस्त दोष प्रक्षीण होकर रहते हैं, मन आत्यन्तिक विनाश को प्राप्त हुआ रहता है और महान जीवन्मुक्ति लक्षण के उदय से परिपूर्ण रहता है