Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 49
अडतालीसवाँ सर्ग समाप्त उनचासवाँ सर्ग गाधि का भूतमण्डल और कीर देश में पुनः जाकर पुनःपुनः श्रीहरि से पूछ कर तथा यह सब माया है यह निश्चयकर क्रम से जीवन्मुक्त होना |
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- Verse 1भगवान् के वाक्य के अर्थ को असंभावना ओर विपरीत भावना की दृढता से न समझ रहे गाधि जगत् के…
- Verse 2तदनन्तर लोगों के मुँह से अपने चाण्डलत्व आदि के वृत्तान्त को पूर्वानुभूत के तुल्य ही सुनकर…
- Verse 3तदुपरान्त थोड़े ही समय में भगवान् श्रीहरि उनके पास आये । भगवान एक बार थोडी-सी आराधना से…
- Verse 4जैसे मेघ मयूर के प्रति बोलता है वैसे ही प्रसन्न हुए भगवान् गाधि के प्रति बोले : हे गाधि,…
- Verse 5गाधि ने कहा : हे देवदेव, मैंने छः महीने तक भूमण्डल ओर कीरराज्यमें भ्रमण किया | वहाँ पर जन…
- Verse 6आपने मुझसे तुमने माया से भूतमण्डल देखा, ऐसा क्यों कहा ? महात्माओं का वचन मोह के नाश के लि…
- Verse 7मायिक पदार्थ भी जनप्रवादो में अव्यभिचरित हो सकते हैं, इसमें उपत्ति कहते हैं। श्री भगवान्…
- Verse 8वे भी अपनी भान्ति से ही वैसा कहते हैं, इसलिए उनके वचन का संवाद सत्यता का आपादक नहीं है, ऐ…
- Verse 9किसी चाण्डाल द्वारा गाँव के छोर पर बनाया गया मकान, जो कि यह पहले मैंने बनाया था यों तुम्ह…
- Verse 10कभी भ्रान्ति रूप प्रतिभास बहुतों का भी एक-सा ही होता है। कौए की ताड के पेड़ के नीचे स्थित…
- Verse 11देखो न बहुत से लोग एक ही स्वप्न देखते हैं जैसे कि निद्रा के समान भ्रमप्रद मदिरा के मद से…
- Verse 12एक ही नीली वनस्थली में मृग के बच्चों के समान बहुत से बालक एक ही बालू आदि से बनाये हुए गृह…
- Verse 13वध, बन्धन, पराजय, पलायन आदि विविध आकारवाले अपने प्रारब्धफल पाक के प्राप्य होने पर भी बहुत…
- Verse 14यदि मानस कल्पना ही जगत् है, तो हेमन्त आदि समय धान आदि के अंकुरों का प्रतिबन्धक ओर जौ आदि…
- Verse 15इसी अर्थ को स्पष्ट करते है। अमूर्त जो भगवान काल है, उसे तो पण्डित लोग जन्मादि विकार रहित…
- Verse 16प्रथम काल की संकल्परूपता सिद्ध करते हैं। वर्ष, कल्प, युगरूप जो यह लौकिक काल है, वह जन्यमा…
- Verse 17प्रासंगिक शंका का खण्डन कर प्रस्तुत का अवलम्बन कर कहते हैं। उन भ्रान्तचित्तवाले भूतदेश के…
- Verse 18तव मुझे क्या करना चाहिये ? यह पूछने पर कहते है । हे साधो, स्वव्यापार में तत्पर होकर यानी…
- Verse 19ऐसा कह कर सबके अधिपति भगवान् विष्णु अन्तर्हित हो गये ओर चिन्ता से व्याप्त बुद्धि से युक्…
- Verse 20तदनन्तर पर्वत पर कुछ महीनों के बीतने पर वहीं उस गाधि ने पुण्रीकाक्ष भगवान् की पुनः आराधन…
- Verse 21एक समय उन्होने आये हुए प्रभु को देखा, प्रणाम किया, मन, वचन ओर कर्म से उनकी पूजा की तथा प्…
- Verse 22गाधि ने कहा : हे भगवन्, अपनी इस चाण्डाल स्थिति का चित्त से स्मरण कर रहा ओर इस जन्म, मरण…
- Verses 23–24इसलिए महामोह की निवृत्ति के लिए उपाय कह कर झटपट न चले जाइये, किन्तु संशय से उत्पन्न मोह क…
- Verse 25श्री भगवान् ने कहा : हे ब्रह्मन्, यह जगत् मायारूपी महाशम्बरासुर का आडम्बररूप हे । इसमे…
- Verse 26भूतदेशवासियों और कीरदेशवासियों ने तुम्हारी ही तरह मिथ्या होते हुए भी सत्य की तरह वैसा भरम…
- Verse 27मैं तुम्हारे चाण्डाल निन्दा सम्बन्ध को प्रगटानेवाले यथार्थ विषय को कहूँगा, तुम इसे सुनो,…
- Verses 28–29जो यह कटंज नाम का चाण्डाल भूतमण्डल में पहले हुआ, वह तुम्हारे द्वारा देखे गये उसी आकार-प्र…
- Verse 30यदि उस प्रकार का अन्य पुरुष हुआ, तो उसका वृत्त मेरे अनुभव पथ में कैसे आरूढ़ हुआ। इस प्रका…
- Verse 31जो वस्तु कभी न देखी गई हो, दूसरे देश में हो और बीत चुकी हो, उसका सामने वर्तमान रूप से दर्…
- Verse 32हे गाधे, जैसे स्वप्न से मनोरथ, संनिपात के भ्रम होते हैं वैसे ही जाग्रत् में भी मन से स्व…
- Verses 33–34जैसे त्रिकालदर्शी योगी की दृष्टि से भविष्यत् वस्तु भी उसके उत्तर काल में होनेवाले दृश्यम…
- Verses 35–36यदि कहो आत्मभिन्न कटंज मे और अनात्मीय उसके धरवार, स्त्री -पुत्र आदि में मेरा वही मैं हूँ,…
- Verse 37तब मैं कैसा हूँ, ऐसा पूछने पर तुम अन्तरालवर्ती (मध्यवर्ती) हो, ऐसा कहते हैं। विविध वासनाओ…
- Verse 38जैसे गृह रचना या गृह प्रवेश आदि सम्यग् प्रयत्न से रहित पुरुष वृष्टि का निवारण करने में स…
- Verse 39जो ही तुम्हारे चित्त में सहसा प्रतिभासित होता है ऊँचे पुरूष से वृक्ष के समान क्षणभर में उ…
- Verses 40–41यहाँ पर इस माया चक्र का मध्यभूत चित्त चारों ओर घूमता है। यदि पुरुष उस चित्त आत्मा में प्र…
- Verses 42–43तुम उठो, पर्वत के कुज में दस वर्ष तक अखिन्न बुद्धि होकर चित्त निरोध का अभ्यास करो | तदनन्…
- Verses 44–45जैसे शरद् ऋतु के बाद (पतझड़ में) वृक्ष पत्तों से रहित हो जाता है (विरसता को प्राप्त हो ज…
- Verse 46जैसे गीला मेघ पर्वत पर जाता है वैसे ही करुणा से आर्द्र चित्तवाले गाधि कल्याणकारी चित्तनिय…
- Verse 47आत्मज्ञान प्राप्ति के उपरान्त महात्मा गाधि अपनी पारमार्थिक सत्ता प्राप्त कर भय-शोक रहित ह…