Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
प्रतिबन्धाभ्यनुज्ञानां कालो दातेति या श्रुतिः ।
विप्र संकल्पमात्रोऽसौ कालो ह्यात्मनि तिष्ठति ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि मानस कल्पना ही जगत् है, तो हेमन्त आदि समय धान आदि के अंकुरों का प्रतिबन्धक ओर
जौ आदि के अंकुरों का सहायक है, इस लोक प्रसिद्धि का बाध होगा, क्योकि मानस कल्पना का बाह्य
काल सहायक नहीं हो सकता है, गाधि की इस शंका का निवारण करते हुए कहते है ।
काल प्रतिबन्ध ओर अभ्यनुज्ञा (स्वीकृति) का दाता है ऐसा जो लोकप्रवाद है, उसमें विरोध नहीं
आता है क्योकि प्रतिबन्ध ओर अनुज्ञा का हेतुभूत काल भी संकल्प मात्र ही है । यानी दिशा विशेष से
अवच्छिन्न सूर्य की क्रिया को देखकर मन ही शास्त्रानुसार मास, ऋतु आदि भेदं की कल्पना करता हे ।
शंका : तब अकल्पितकाल कौन है ?
समाधान : जो अकल्पित अखण्डकाल (परमात्मा) है, वह स्वात्मा में स्थित रहता हे, किसी के
लिए न तो प्रतिबन्धक होता है ओर न किसी को अभ्युज्ञा ही देता हे