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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, Verses 35–36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 35,36

संस्कृत श्लोक

सर्वमेवाहमेवेति तत्त्वज्ञो नावसीदति । न गृह्णाति पदार्थेषु विभागानर्थभावनम् ॥ ३५ ॥ तेनासौ भ्रमयोगेषु सुखदुःखविलासिषु । न निमज्जति मग्नोऽपि तुम्बीपात्रमिवाम्भसि ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कहो आत्मभिन्न कटंज मे और अनात्मीय उसके धरवार, स्त्री -पुत्र आदि में मेरा वही मैं हूँ, तदीय ही वह (गृह आदि) मेरा है, यो मज्जन कैसे हुआ ? तो इस पर थोडा कहा जाता है । अतत्त्वज्ञ सभी लोगों का अनात्मा देह में और अनात्मीय गृह, कलत्र आदि में अहम्‌“ “मम ऐसा अभिमान दिखाई देता है, केवल आत्मवित्‌ का ही उनमें मज्जन नहीं होता, इस अभिप्राय से कहते है। यह देह मैं हूँ तथा ये घर द्वार आदि मेरे हैं, यों आत्मज्ञानी निमग्न नहीं होता । यह देह मैं हूँ तथा ये घर-द्वार आदि मेरे हैं, यों अनात्मज्ञानी निमग्न होता है ॥ ३ ४॥ सबमें अहंभावना से भी तत्त्वज्ञानी का उनमें मज्जन नहीं होता है, क्योकि परिच्छिन्न अहंभाव ही मज्जन का हेतु है, ऐसा कहते हैं। सब कुछ मैं ही हूँ ऐसी भावना से तत्त्वज्ञानी दुःखी नहीं होता, वह पदार्थों में भेदरूप अनर्थ भावना का ग्रहण नहीं करता है । इसी कारण वह सुख, दुःख से युक्त भ्रमो में जल में तुम्बी के समान निमग्नप्राय होता हुआ भी (४१) नहीं होता