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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

त्वं तावद्वासनाजालग्रस्तचित्तो विचेतनः । किंचिच्छेषमहाव्याधिरिव न स्वस्थमागतः ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

तब मैं कैसा हूँ, ऐसा पूछने पर तुम अन्तरालवर्ती (मध्यवर्ती) हो, ऐसा कहते हैं। विविध वासनाओं से ग्रस्त चित्तवाले, चेतनारहित तुम जिसकी महाव्याधि कुछ शेष रह गई हो, उस रोगी के सदुश हो, जैसे किंचित्‌ अवशिष्ट महाव्याधिवाला पुरुष स्वास्थ्य को प्राप्त नहीं होता वैसे ही तुम भी स्वरूप में अवस्थित आत्मा को प्राप्त नहीं हुए हो