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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथ गाधिर्गते विष्णौ पुनर्भूतादिकं क्रमात् । स्वयं मोहविचारार्थं बभ्रामाभ्रमिवाम्बरे ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ के वाक्य के अर्थ को असंभावना ओर विपरीत भावना की दृढता से न समझ रहे गाधि जगत्‌ के अधिष्ठानभूत आत्मतत्व के साक्षात्कार के बिना ही पूर्वद्ृष्ट देशआदिका बाधहो सकता है या नहीं यह परीक्षापूर्वक अनुभव करनेकी इच्छा से फिर भूतमण्डल आदि देशों में भटके, ऐसा कहते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, तदुपरान्त भगवान्‌ विष्णु के चले जाने पर फिर गाधि स्वयं अपने मोह के विचारके लिए भूतमण्डल आदि देशों में आकाश में मेघ की नाई क्रम से भटके

सर्ग सन्दर्भ

अडतालीसवाँ सर्ग समाप्त उनचासवाँ सर्ग गाधि का भूतमण्डल और कीर देश में पुनः जाकर पुनःपुनः श्रीहरि से पूछ कर तथा यह सब माया है यह निश्चयकर क्रम से जीवन्मुक्त होना |