Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, Verses 40–41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, verses 40–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
चित्तं नाभिः किलास्येह मायाचक्रस्य सर्वतः ।
स्थीयते चेत्तदाक्रम्य तन्न किंचित्प्रबाधते ॥ ४० ॥
त्वमुत्तिष्ठ गिरेः कुञ्जे दशवर्षाण्यखिन्नधीः ।
तपः कुरु ततो ज्ञानमनन्तं समवाप्स्यसि ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
यहाँ पर इस माया चक्र का मध्यभूत चित्त चारों ओर
घूमता है। यदि पुरुष उस चित्त आत्मा में प्रविलापन द्वारा तिरस्कार करके स्थित हो जाय, तो वह माया
चक्र कुछ भी पीड़ा नहीं पहुँचाता है