Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
इत्युक्त्वा पुण्डरीकाक्षस्तत्रैवान्तरधीयत ।
वाताभ्रवद्दीपकवद्यमुनोत्पीडवत्क्षणात् ॥ ४२ ॥
गाधिर्विवेकवशजं वैराग्यपदमागतः ।
शरत्समयपर्यन्ते वैरस्यमिव पादपः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
तुम उठो, पर्वत के कुज में दस वर्ष तक अखिन्न बुद्धि होकर
चित्त निरोध का अभ्यास करो | तदनन्तर तुम अनन्त ज्ञान प्राप्त करोगे ॥ ४ १॥ ऐसा कहकर भगवान्
श्रीहरि वायु में लीन मेघ की नाई, बुझे हुए दीपक की भाँति और यमुना की तरंग की भाँति एक क्षण में
वहीं पर अन्तर्हित हो गये