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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, Verses 44–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

विचित्रं चेष्टितं धातुरसमञ्जसमागतम् । भ्रमद्भमभरोन्मुक्तमतिर्मन्दमगर्हयत् ॥ ४४ ॥ जगाम करुणार्द्रात्मा नियमायोत्तमश्रिये । विश्रान्त्यै ऋष्यमूकं तु पयोधर इवाचलम् ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे शरद्‌ ऋतु के बाद (पतझड़ में) वृक्ष पत्तों से रहित हो जाता है (विरसता को प्राप्त हो जाता है) वैसे ही गाधि विवेकवश उत्पन्न हुए वैराग्य को प्राप्त हुए ॥४ ३॥ गाधि पत्र सर्वोहिंभावना में भी अहंकारता है, इसलिए निमग्नप्राय कहा है । ने, जिनकी मति घूम रही भ्रमराशि से उन्मुक्त हो चुकी थी, प्राक्तन कर्म रूप देवकी योग्य चाण्डाल भाव प्रदर्शनरूप विचित्र चेष्टा की थोड़ी निन्दा की