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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 35

चौंतीसवाँ सर्ग समाप्त पैंतीसवाँ सर्ग साक्षात्कृत आत्मा का मन में विचारकर और प्रणाम कर उसके बल से जीते गये बन्धनों का अनुसन्धान कर प्रह्लाद का प्रसन्न होना ।

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  1. Verse 1प्रह्नमाद ने कहा : ओमिति ब्रह्म (ॐ ब्रह्म है), ओमितीदं सर्वम्‌ (ॐ यह सब है)। एतद्रे सत्यक…
  2. Verse 2यह आत्मा एकमात्र देह के अन्तर्गत है, यह बाह्य सूर्य आदि सब कुछ कैसे हो सकता है ? ऐसी यदि…
  3. Verse 3केवल उस्ने प्रकाश्य होने के कारण सब कुछ तदात्म कैसे है ? ऐसी यदि किसी को शंका हो, तो उस प…
  4. Verse 4सदा निष्क्रिय रहता भी वह बैठे हुए की तरह गति आदि व्यापार से विरत नहीं है, क्योकि वायु और…
  5. Verse 5ऐसी परिस्थिति में कुर्वन्नपि न लिप्यते“ ऐसा कैसे कहते हैं ? तो इस पर कहते हैं । पूर्वजन्म…
  6. Verse 6यदि कोई कहे कि भोग यदि भोक्ता का स्पर्श नहीं करते हैं, तो भोगो से कर्मो की सफलता कैसे होग…
  7. Verse 7यदि कोई शंका करे कि आत्मा में यदि स्पन्दन ही नहीं है, तो वह जगत्‌ को कैसा घुमायेगा, तो इस…
  8. Verse 8यदि कोई कहे कि मन अथवा इन्द्र्यो ही देहादि को कर्म में प्रवृत्त करती हैं, आत्मा नहीं करता…
  9. Verses 9–11भोगों का भोग करनेवाले विभु आत्मा सम्राट्‌ के समान अपना आत्मा में स्वस्थ होकर स्थित होता ह…
  10. Verse 12दुरदेशवर्ती मित्र आदि का जोर से चिल्लाकर पुकारने से ओर नजदीक में स्थित मित्र का केवल पुका…
  11. Verse 13जैसे सेवित होने पर सर्वसम्पत्तिशाली धनी को अभिमान या गर्व हो सकता है वैसे सेवन किये जा रह…
  12. Verse 14कैसे यह देह में विद्यमान रहता है ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं। फूलों में सुगन्ध की तरह,…
  13. Verse 15जैसे चिरकाल से पहले न देखा गया और तत्काल आगे देखा गया पिता आदि बन्धु परिज्ञान में नहीं आत…
  14. Verse 16जैसे प्रिय बन्धुजन के प्राप्त होने पर परम आनन्द होता हे वैसे ही विचार के द्वारा इस परमेश्…
  15. Verses 17–18अतिशय आनन्द देनेवाले इस परमात्मरूप परम बन्धु के दर्शन होने पर वे दृष्टियाँ प्राप्त होती ह…
  16. Verse 19एकमात्र उसके विज्ञान से सर्वविज्ञान होता है, ऐसा कहते है । इस परमात्मा का दर्शन होने पर स…
  17. Verses 20–21एव सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।* इस श्रुति का अवलम्बन करके कहते है । सो…
  18. Verse 22असाधारण जीवभेदभ्रमदशा में भी इसकी साधारण एकात्म्यस्कूर्ति की क्षति नहीं होती, ऐसा कहते है…
  19. Verse 23चेतना (पूर्वकाल और उत्तरकाल का अनुसन्धान) ओर कलना (वर्तमान दर्शन) रूपी, बाह्य और आभ्यन्तर…
  20. Verses 24–25आकाश में यह शून्यता है, वायु में यह स्पन्दन है, तेज में यह प्रकाश है, जल में यह मधुर रस ह…
  21. Verse 26काजल में जैसे कालिमा है, हिमकण में जैसे शीतलता हे, पुष्पों मेँ जसे सुगन्ध हे वैसे ही देह…
  22. Verses 27–28इसकी मन, इन्द्रिय आदि से व्यावृत्त सर्वक्षेत्र साधारण प्रकाशता को ही दिखलाते है । जैसे सत…
  23. Verse 29जैसे अत्यन्त सूक्ष्म रेणु से आकाश का सम्बन्ध नहीं होता, जैसे जल से कमल दल का सम्बन्ध नहीं…
  24. Verse 30तुम्बी के ऊपर जलधाराओं के तुल्य देह में सुख-दुःख गिरे अथवा न गिरे उससे तुम्बी के आकाश के…
  25. Verses 31–32दीपक के अंगभूत तेल, बत्ती, बर्तन आदि का अतिक्रमण करके निकला हुआ दीप प्रकाश जैसे रस्सी से…
  26. Verses 33–36शरीर के सैकड़ों टुकड़े होने पर शरीरी के (आत्मा के) कौन खण्ड खण्ड होते हैं, घडा चाहे टुटे,…
  27. Verse 37अदृश्य पिशाच के समान यह मिथ्या मन उदित हुआ है, ज्ञान से (मन से अतिरिक्त आत्मा के ज्ञान से…
  28. Verses 38–39न मेरी भोग भोगने की अकांक्षा है और न भोगों के त्याग में मेरी वांछा है जो आता है वह आये ओर…
  29. Verse 40सुखो की मुझे अपेक्षा नहीं हे ओर दुःखो में मेरी उपेक्षा नहीं है। सुख-दुःख चाहे आये अथवा जा…
  30. Verses 41–42अत्यन्त विनष्ट हुए विवेकरूप सर्वस्व को दूरकर इतने समय तक अज्ञानरूपी शत्रु ने मुञ्चे क्लेश…
  31. Verse 43इस समय परम ज्ञानरूपी मन्त्र से इस अहंकाररूपी पिशाच को शरीररूपी वृक्ष के खोखले से मैंने नि…
  32. Verse 44अहंकाररूपी यक्ष से विहीन यह मेरा शरीररूपी महान वृक्ष अत्यन्त पवित्रता को प्राप्त होकर प्र…
  33. Verse 45दुराशारूपी दोष का नाश होने पर विवेकरूपी धन समृद्धि को प्राप्त कर मेरी मोहरूपी दरिद्रता नष…
  34. Verses 46–66ने ज्ञातव्य सब कुछ जान लिया है तथा द्रष्टव्य सब कुछ देख लिया हे । इस समय मुझे वह वस्तु प्…
  35. Verses 67–68हे आत्मन्‌, जिसके इन्द्रियरूपी भयंकर मगर शान्त हो गये हैं, जिसका चित्तरूपी बड़वानल नष्ट ह…
  36. Verses 69–70हे आत्मन्‌, जिसमें आनन्दरूपी कमल खिले हैं और चिन्तारूपी लहरें शान्त हो चुकी हैं ऐसे सुन्द…
  37. Verses 71–72हे पूणत्मिन्‌- "एतस्माज्जायते प्राणो मन: सर्वेन्द्रियाणि च" इत्यादि श्रुति में कही गई सत्…
  38. Verse 73तेलरहित, परम प्रेम को उद्दीप्त करनेवाले, वृत्ति द्वारा निष्क्रमणरूप वत्ती से युक्त सब वस्…
  39. Verses 74–83अब मेरा पौरुष सफल है, यो उसका अभिनन्दन करते हैं। जैसे लोहे के घन से तपा हुआ लोहा टूट जाता…
  40. Verses 84–86आश्चर्य करते है । इतने समय तक मे कोन हुआ ? इससे यह मैं मिथ्या ही दृढ़ अहंकार को प्राप्त ह…
  41. Verse 87अब दोष ओर विक्षेपरहित मेरा मन शान्त हो गया है, ऐसा कहते है। विषयरहित, अतएव मनन ओर एषणारहि…
  42. Verse 88मन की शान्ति से ही सब आपत्तियों की निवृत्ति ओर निरतिशय आनन्दरूप आत्मा की प्राप्ति का निर्…