Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verses 74–83
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, verses 74–83 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 74-83
संस्कृत श्लोक
मदनानलसंतप्ते शीतेन मनसा मनः ।
भग्नमन्तर्मया तप्तमयसेव बलादयः ॥ ७४ ॥
इन्द्रियेणेन्द्रियं छित्त्वा छित्त्वा च मनसा मनः ।
अहंकृतिमहंकृत्या छित्त्वा शेषो जयाम्यहम् ॥ ७५ ॥
भावेनाभावमाच्छिद्य हित्वा तृष्णामतृष्णया ।
निष्पिष्य प्रज्ञयाऽप्रज्ञां ज्ञोऽज्ञः सत्योसि ते नमः ॥ ७६ ॥
मनसा मनसि च्छिन्ने निरहंकारतां गते ।
भावेन गलिते भावे स्वच्छस्तिष्ठामि केवलः ॥ ७७ ॥
निर्भावं निरहंकारं निर्मनस्कमनीहितम् ।
केवलं स्पन्दशुद्धात्मन्येव तिष्ठति मे वपुः ॥ ७८ ॥
हेलानुकम्पितानन्तविश्वेशादतिशायिनी ।
परमोपशमोपेता जातेयं मम निर्वृतिः ॥ ७९ ॥
प्रशान्तमोहवेतालो गताहंकारराक्षसः ।
कदाशारूपिकोन्मुक्तो जातोऽस्मि विगतज्वरः ॥ ८० ॥
तृष्णारज्जुगुणं छित्त्वा मच्छरीरकपञ्जरात् ।
न जाने क्व गतोड्डीय दुरहंकृतिपक्षिणी ॥ ८१ ॥
उद्धूलिते घनाज्ञानकुलाये कायपादपात् ।
न जाने गत उड्डीय क्वाहंभावविहंगमः ॥ ८२ ॥
दुराशादीर्घदौरात्म्यधूसरा भोगभस्मना ।
भयभोगिहिता दिष्ट्या भूयस्यो वासनाः क्षताः ॥ ८३ ॥
हिन्दी अर्थ
अब मेरा पौरुष सफल है, यो उसका अभिनन्दन करते हैं।
जैसे लोहे के घन से तपा हुआ लोहा टूट जाता है वैसे ही शम, दम आदि से युक्त मन से कामाग्नि
से सन्तप्त मन को मैंने जबरदस्ती नष्ट कर दिया है । प्रत्यगात्मोन्मुख चक्षु आदि इन्द्रियों से बाह्य
पदार्थोन्मुख इन्द्रियो को नष्ट कर, प्रत्यगात्मोन्मुख मन से बाह्य पदार्थोन्मुख मन का उच्छेद कर और
प्रत्यगात्मोन्मुख अहंकार से बाह्यपदार्थन्मुख अहंकार उच्छेदकर अवशिष्ट चिन्मात्र मैं सर्वोत्कृष्ट रूप
से स्थित हूँ। श्रद्धा से अश्रद्धा का उच्छेद कर, अतृष्णा से तृष्णा का त्याग कर, विचारवती बुद्धि से
अविचार, सन्देहादि रूप अप्रज्ञा का विनाशकर ज्ञातृत्वाभिमानशून्य ज्ञानमात्रस्वभाव ही तुम हो, ऐसे
प्रत्यकृचैतन्यरूप तुमको नमस्कार हे । मन से उच्छिन्न मन के निरहंकार होने पर तथा ब्रह्महंभाव से
देहादि में अहंभाव के विनष्ट होने पर केवल स्वच्छ चिन्मात्रस्वभाव मैं रहता हूँ। भावना में हेतुभूत बुद्धि
से रहित, अहंकाररहित, मनरहित, इच्छा हेतुभूत चित्त से शून्य मेरा शरीर एकमात्र प्राणनक्रिया से
शुद्धस्वरूपवाले जीवन्मुक्त आत्मा मेँ ही स्थित हे । लीला से ही भोग-ऐश्वर्यदान द्वारा अपने अनन्त
भक्तों पर अनुग्रह करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु आदि से भी उत्कृष्ट निरतिशयानन्द विश्रान्ति, जो परम
शान्ति से युक्त है, मुझे प्राप्त हो गई । मेरा मोहरूपी वेताल शान्त हो चुका है, अहंकाररूपी राक्षस
मुझको छोडकर चला गया है ओर कुत्सित आशारूपी पिशाचिनी से मैं छुटकारा पा चुका हूँ, अतएव में
सन्तापरहित हो गया हूँ। तृष्णारूपी रस्सी को तोड़कर दुरहंकाररूपी चिड़िया मेरे शरीररूपी पिंजर से
उड़कर न जाने कहाँ चली गई हे । निविड अज्ञानरूपी घोंसले को ज्ञानाभ्यासवश चूर-चूर करके उठा
देने पर अहंभावरूपी पक्षी मेरे शरीररूपी वृक्ष से उड़कर न मालूम कहाँ चला गया हे बड़ी प्रसन्नता की
बात है कि दुराशाओं से ओर लम्बे अरसे से दुष्ट देह आदि में आत्मतत्त्व के अभिमान से मलिन और
भयरूपीसर्पो के लिए हितैषी बहुत-सी मेरी दुर्वासानाएँ समाधि से उच्छिन्न हो गई है