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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

उद्भवत्यभयो भावं भुवनानि ततस्ततः । ब्रह्मादितृणपर्यन्तं जगदावर्तयन्स्थितः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि भोग यदि भोक्ता का स्पर्श नहीं करते हैं, तो भोगो से कर्मो की सफलता कैसे होगी ? तो इस पर कहते हैं। वस्तुतः भयरहित यह आत्मा ही तत्‌ तत्‌ कर्मो के अनुरूप स्वयं होता है और उत्पन्न हुआ ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त भोक्ता ओर भोगों तथा उनके आधार चौदह भुवनो को केवल अपनी सन्निधि से घुमाता रहता हे । वही इसका कर्मफल हे