Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अविचारवशादेष हृदयस्थोऽपि चेतनः ।
न ज्ञायते चिरादृष्टो दृष्टबन्धुरिवाग्रतः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चिरकाल से पहले न देखा गया और तत्काल आगे देखा गया पिता आदि बन्धु
परिज्ञान में नहीं आता है वैसे ही सदा हृदय में विद्यमान भी यह चेतन अविचारवश ज्ञात नहीं होता