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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verses 46–66

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, verses 46–66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 46-66

संस्कृत श्लोक

विवेकधनसंभारान्स्थितोऽस्मि परमेश्वरः । ज्ञातं ज्ञातव्यमखिलं दृष्टा द्रष्टव्यदृष्टयः ॥ ४६ ॥ तत्प्राप्तमधुना येन नाप्राप्तमवशिष्यते । दिष्ट्या दूरोज्झितानर्थामपेतविषयोरगाम् ॥ ४७ ॥ संशान्तमोहनीहारां शान्ताशामृगतृष्णिकाम् । रजोरहितसर्वाशां शीतलोपशमद्रुमाम् ॥ ४८ ॥ प्राप्तोऽस्मि विततां भूमिमुन्नतां पारमार्थिकीम् । स्तुत्या प्रणत्या विज्ञप्त्या शमेन नियमेन च ॥ ४९ ॥ लब्धोऽयं भगवानात्मा दृष्टश्चाधिगतः स्फुटम् । अहंकारपदातीतश्चिरात्संस्मृतिमागतः ॥ ५० ॥ स्वभावाद्भगवानात्मा विष्णोर्ब्रह्म सनातनम् । इन्द्रियोरगगर्तेषु मरणश्वभ्रभूमिषु ॥ ५१ ॥ तृष्णाकरञ्जकुञ्जेषु कामकोलाहलेषु च । वासनावनजालेषु जन्मकूपान्तरेषु च ॥ ५२ ॥ दुःखदावाग्निदाहेषु दुःखदावाग्निहारिषु । पातोत्पातदशालक्षैर्मज्जनोन्मज्जनभ्रमैः ॥ ५३ ॥ आविर्भावतिरोभावैराशापाशविचेष्टनैः । अहं चिरमहंकारद्विषा समवमोषितः ॥ ५४ ॥ निशायामल्पवीर्यात्मा पिशाचेनेव जङ्गले । स्वयमेव त्वथेदानीं क्रियाशक्त्या स्वयैव हि ॥ ५५ ॥ शौरिणा व्यपदेशेन विवेकश्रीर्विबोधिता । प्रबुद्धे भवतीशाने तमहंकारराक्षसम् ॥ ५६ ॥ न पश्यामि नभोदीपे ज्वलिते तिमिरं यथा । तस्याहंकारयक्षस्य मनोविवरवासिनः ॥ ५७ ॥ दीपस्येव प्रशान्तस्य न वेद्मि गतिमीश्वरः । दृष्ट एव त्वयीशाने पलायनपरायणः ॥ ५८ ॥ संपन्नो मदहंकारश्चोरः सूर्योदये यथा । असदभ्युत्थिते तस्मिन्नहंकारे पिशाचवत् ॥ ५९ ॥ गते तिष्ठाम्यहं स्वस्थो निर्गोनस इव द्रुमः । शाम्यामि परिनिर्वामि जगत्यस्मिन्प्रबोधवान् ॥ ६० ॥ तस्करेणोज्झितोऽस्मीति निवृर्तोऽस्मि चिरोदयम् । शैत्यमभ्यागतोस्म्यन्तः शान्ताशामृगतृष्णिकः ॥ ६१ ॥ प्रावृडम्बुभरस्नातः शान्तदाव इवाचलः । प्रमार्जितेहमित्यस्मिन्पदे स्वार्थविचारतः ॥ ६२ ॥ को मोहः कानि दुःखानि काः कदाशाः क आधयः । नरकस्वर्गमोक्षादिभ्रमाः सत्यामहंकृतौ ॥ ६३ ॥ भित्तावेव प्रवर्तन्ते चित्रेहा न नभस्तले । अहंकारकलापित्ते चित्ते ज्ञानचमत्कृतिः । न राजतेंऽशुके म्लाने यथा कुङ्कुमरञ्जना ॥ ६४ ॥ निरहंकारजलदे तृष्णासारविवर्जिते । भाति चित्तशरद्व्योम्नि स्वच्छता कान्तिशालिनी ॥ ६५ ॥ निरहंकारपङ्काय संप्रसन्नान्तराय च । मह्यमानन्दसरसे तुभ्यमात्मन्नमो नमः ॥ ६६ ॥

हिन्दी अर्थ

ने ज्ञातव्य सब कुछ जान लिया है तथा द्रष्टव्य सब कुछ देख लिया हे । इस समय मुझे वह वस्तु प्राप्त हो चुकी हे, जिससे कुछ भी अप्राप्त नहीं रहता है । मैं ऊँची और विस्तृत पारमार्थिक भूमिका को प्राप्त हो चुका हूँ, जिसमें अनर्थो का नाम-निशान नहीं है, विषरूपी साँप नहीं रह गये है, आशारूपी मृगतृष्णा शान्त हो चुकी हे, मोहरूप कुहरा नष्ट हो गया हे, जिसकी चारों दिशाएँ रजो गुण (धूलि) से रहित है और जिसमें शीतल शान्तिरूपी वृक्ष हे । विष्णु भगवान्‌ की स्तुति से, प्रणाम से, प्रार्थना से, शम ओर नियम से मैं भगवान्‌ आत्मा को पा चुका हूँ ओर मैंने इसे भलीभाँति जान लिया हे । भगवान्‌ विष्णु के अनुग्रह से विनाशी ब्रह्मरूप भगवान्‌ आत्मा, जो अहंकार से शून्य है, चिरकाल से मेरे स्मृति पटल पर आरूढ हो गये है । वासनारूपी घोर वनों मे, जहाँ पर इन्द्रियरूपी साँपों के अनेक बिल हैं, मरणरूपी बड़े-बड़े गड्ढे है, तृष्णारूपी करंजकुज (करंजों की झाड़ियाँ) है, जो काम कोलाहल से पूर्ण हैं, जिनमें दुःखरूपी वनाग्नियाँ धधकती हैं तथा दुःखदायी वनाग्नि के सदुश क्रूर पर धन-प्राण हरनेवाले (चोर) हैं, अहंकार रूपी शत्रु ने नीचे गिरने ओर ऊपर चढ़ने के तुल्य लोकों की विपत्ति ओर सम्पत्तियों से, अधोगति और उत्तमगतियों से, आविर्भाव और तिरोभावोँसे एवं आशा- पाशों की विविध चेष्टाओं द्वारा मुझे ऐसे ही सर्वस्व हरण द्वारा पीडित किया, जैसे कि रात्रि के समय अल्प बलवाले पुरुष, को जंगल में पिशाच पीडित करता है । किन्तु इस समय मेने प्रसन्न हुए विष्णु भगवान के बहाने अपनी ही क्रिया-शक्ति से स्वयं विवेक को उद्दीप्त कर लिया हे । उक्त विवेक से परमेश्वर आत्मा के प्रबुद्ध होने पर मैं उस अहंकाररूपी पिशाच को ऐसे ही नहीं देख रहा हूँ जैसे कि सूर्य के उदित होने पर अन्धकार नहीं दिखाई देता है । जैसे बुझे हुए दीपक की गति ज्ञात नहीं होती यानी वह कहाँ चला जाता है यह मालूम नहीं होता वैसे ही मनरूपी बिल मेँ निवास करनेवाले उस अहंकररूपी पिशाच की गति को परमेश्वररूप मैं नहीं जानता हूँ। जैसे सूर्योदय होने पर चोर भागने की तैयारी करता है वैसे ही ईश्वररूपी आपका साक्षात्कार होते ही मेरा अहंकार भागने के लिए तत्पर हो गया । पिशाचकी नाई भ्रान्तिवश मिथ्या उदित हुए अहंकार के चले जाने पर मे जिससे अजगर भाग गया हो उस बगीचे के तुल्य स्वस्थ होकर बैठा हू । इस जगत्‌ में ज्ञानवान्‌ मे अहंकाररूपी चोर से छुटकारा पा चुका हूँ ओर चिरकाल से निवृत्त हुआ हूँ यों सोचकर मैं विश्रान्ति को प्राप्त हो रहा हूँ ओर निर्वाण को प्राप्त हो रहा हूँ। वर्षा ऋतु की जलराशि से सीचे गये अतएव वनाग्नि की लपटों से रहित पवन के समान मैं हृदय में शीतलता को प्राप्त हो गया हू । मेरी आशारूपी मृगतृष्णा शान्त हो चुकी है । आत्मतत्त्व के विचार से अहंकार के परिमार्जित होने पर क्या मोह हे, क्या दुःख है, क्या तुच्छ आशाएँ हैं और क्या मानसिक चिन्ता हैं यानी ये कुछ भी नहीं रहते हैँ । जैसे चित्रनिर्माण की चेष्टा दीवार में ही होती है आकाश में नहीं होती वैसे ही अहंकार के रहते ही नरक, स्वर्ग, मोक्ष आदि भ्रम होते हैं । जैसे वस्त्र के मलिन होने पर उसमें कुंकुम का रंग शोभित नहीं होता है वैसे ही चित्त में अहंकारावेशरूप पित्तज उन्माद के रहने पर ज्ञान चमत्कार शोभित नहीं होता है । अहंकारूपी मेघ से शून्य, तृष्णारूपी मूसलाधारवृष्टि से रहित चित्तरूपी शरत्कालीन आकाश में आत्मरूपी चन्द्रमा के प्रकाश से शोभित होनेवाली निर्मलता शोभित होती है। हे आत्मन्‌, अहंकाररूपी कीचड़ से हीन, अत्यन्त प्रसन्न आनन्द के सरोवर प्रत्यगात्मरूप तुमको ब्रह्म) बार बार नमस्कार है