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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

अन्यः पश्यत्यहो मौर्ख्यं कस्येयं खलु चक्रिका । भुङ्क्ते प्रकृतिरादत्ते मनोदेहस्य संकटः ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

अदृश्य पिशाच के समान यह मिथ्या मन उदित हुआ है, ज्ञान से (मन से अतिरिक्त आत्मा के ज्ञान से) जड मन का विनाश होने पर हमारी क्या क्षति हुई ? पहले (अज्ञानावस्था मेँ) जिसकी सुख-दुःखमयीवासना है, इस प्रकार का मेरा मन हुआ था, अब तो मेरी एकमात्र अपरिच्छिन्न सुख विश्रान्ति हो गई है ॥ ३ ४, ३ ५॥ अन्य भोग करता है, अन्य ग्रहण करता है, अन्य की अनर्थगति होती है, यह देखता हे इस भोक्ता आदि की एकता के कारण अध्यासरूप मूर्खता किस जादूगर की चक्की के समान घुमाने की चातुरी है ॥ ३ ६॥ प्रकृति भोग करती है, मन ग्रहण करता है, देह को क्लेश प्राप्त होता है, आत्मा प्रवृत्ति आदि से दुष्ट (दोषारोपितः) होता हे । विचार करने पर केवल आत्मा में कुछ भी मूर्खता नहीं है, इसलिए कोई क्षति नहीं हे