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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

पूर्वमद्य तथेदानीमिहामुत्रोभयत्र च । विहितोऽविहितोऽप्येष समः सर्वासु वृत्तिषु ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी परिस्थिति में कुर्वन्नपि न लिप्यते“ ऐसा कैसे कहते हैं ? तो इस पर कहते हैं । पूर्वजन्म में, आज और इस समय इस लोक में, पर लोक में तथा इसलोक की सन्धिरूप स्वप्न में शास्त्र से अनिषिद्ध (विहित) शुभ कर्म के फलों का भोग करता हुआ और शास्त्रनिषिद्ध अशुभ कर्मो के फलों का भोग करता हुआ भी यह सब भोगवृत्तियों में सम ही रहता हे । भाव यह कि दृश्य भोगों से द्रष्टा में विकार का संभव नहीं है