Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verses 84–86
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, verses 84–86 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 84-86
संस्कृत श्लोक
एतावन्तमहं कालं कोऽभूवं चित्रमीदृशम् ।
येनाहमेष मिथ्यैव दृढाहंकारतां गतः ॥ ८४ ॥
अद्याहमस्मि जातोऽयमहमद्य महामतिः ।
अहंकारमहाभ्रेण यत्कृष्णेनालमुज्झितः ॥ ८५ ॥
दृष्टोऽयमात्मा भगवांस्तथैवाधिगतो मया ।
आलब्धश्चानुभूतोऽङ्गं स्वानुभूतौ नियोजितः ॥ ८६ ॥
हिन्दी अर्थ
आश्चर्य करते है ।
इतने समय तक मे कोन हुआ ? इससे यह मैं मिथ्या ही दृढ़ अहंकार को प्राप्त हुआ, ऐसा आश्चर्य
है। आज मैं अनुभव में आ रहे निरतिशयानन्द स्वभाववाला हो गया हू । मेरी साक्षात्कारवृत्ति अपरिच्छिन्न
ब्रह्माकार हो गई है, क्योकि अहंकाररूपी काले बादल ने मेरा सर्वथा त्याग कर दिया हे । मैंने भगवान्
आत्मा का वाक्य प्रमाण से दर्शन कर लिया है और उनका मनन से ज्ञान भी कर लिया है । समाधि में मन
से श्लेषपूर्वक उन्हें पा लिया हे ओर समाधि में उनका अनुभव कर लिया हे । अपने शरीर के समान सदा
अनुभूति में उनका नियोग भी कर लिया है । कहा भी है : देहात्मज्ञानवज्जानं देहात्मज्ञानवाधकम् ।
आत्मन्येव भवेद् यस्य स नेच्छन्नपि मुच्यते ॥ (देहात्मज्ञान के समान जिसे देहात्मज्ञान का बाधक ज्ञान
हो जाता है, वह मुक्ति न चाहता हुआ भी मुक्त हो जाता है)