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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verses 71–72

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, verses 71–72 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 71,72

संस्कृत श्लोक

कलाकलितरूपाय निष्कलायामृतात्मने । सदोदिताय पूर्णात्मन् शशिने ते नमो नमः ॥ ७१ ॥ सदोदिताय शान्ताय महाहृद्ध्वान्तहारिणे । सर्वगायाप्यदृश्याय चित्सूर्याय नमो नमः ॥ ७२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे पूणत्मिन्‌- "एतस्माज्जायते प्राणो मन: सर्वेन्द्रियाणि च" इत्यादि श्रुति में कही गई सत्रह कलाओं से अथवा "षोडशकलः सोम्यपुरुषः* इस श्रुति में दिखलाई गई सोहल कलाओं से जिसने अपने रूप की कल्पना है, वस्तुतः जो निरवयव है, सदा उदित अमृतरूपी चन्द्ररूप (> ) आपको नमस्कार हे । सदा उदित, सन्ताप न पहुँचानेवाले, हृदय के अन्धकार (अज्ञान) का नाश करनेवाले, सर्वव्यापी होने पर भी अदृश्य, चैतन्यरूपी सूर्य को पुनः पुनः नमस्कार है