Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verse 87
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, verse 87 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 87
संस्कृत श्लोक
गतास्पदं गतमननं गतैषणं तिरस्कृतं निपुणमहंकृतिभ्रमैः ।
निरीहितं व्यपगतरागरञ्जनं विकौतुकं प्रशममिदं गतं मनः ॥ ८७ ॥
हिन्दी अर्थ
अब दोष ओर विक्षेपरहित मेरा मन शान्त हो गया है, ऐसा कहते है।
विषयरहित, अतएव मनन ओर एषणारहित, अहंकारभ्रमों से सर्वथा मुक्त अतएव निश्चेष्ट, रागो
के सम्पर्क से रहित और भोगोत्कण्ठा से शून्य मेरा मन ईघनरहित अग्नि के समान शान्ति को प्राप्त हो
गया हे