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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verses 69–70

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, verses 69–70 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 69,70

संस्कृत श्लोक

प्रफुल्लानन्दपद्माय शान्तचिन्तामयोर्मवे । मह्यं सन्मानसायात्मंस्तुभ्यमन्तर्नमो नमः ॥ ६९ ॥ संविदाभासपक्षाय पद्मकोटरवासिने । सर्वमानसहंसाय स्वात्मनेऽन्तर्नमो नमः ॥ ७० ॥

हिन्दी अर्थ

हे आत्मन्‌, जिसमें आनन्दरूपी कमल खिले हैं और चिन्तारूपी लहरें शान्त हो चुकी हैं ऐसे सुन्दर मानसरोवररूप प्रत्यगात्मभूत तुमको पुनः पुनः नमस्कार है बुद्धि और उसकी वृत्ति में प्रतिबिम्बित चैतन्य ही जिसके पंख है, जो हृदयरूपी कमल के मध्य में निवास करता है और जो मानसरोवर मेँ हंस के समान सबके मन का हंसरूप है ऐसे आत्मा को बारबार नमस्कार हे