Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 29
अद्राईसर्वौँ सर्ग समाप्त उन्तीसवाँ सर्ग॑ जीवन्मुक्त बलि की राज्यसम्पत्ति ओर पाताल में बन्धन का वर्णन एवं श्रीरामचन्द्रजी के लिए बलि के समान पूर्णपद मेँ स्थिति का उपदेश ।
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- Verses 1–2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, तदनन्तर पूरे एक हजार दिव्य वर्षो के बाद असुरश्रेष्ठ…
- Verse 3जागते ही बलि ने जब तक दावन उसके निकट नहीं आये तब तक समाधि भवन में क्षण भर विचार किया
- Verse 4अहा ! यह पदवी बड़ी रमणीय, शीतल ओर पारमार्थिक हे । मैं इस पदवी में एक क्षण (०३) स्थित होकर…
- Verse 5इसलिए इसी पदवी का अवलम्बन करके मैं विश्रान्ति सुख को प्राप्त करूँ। बाह्य विभूतियों के उपभ…
- Verse 6समाधि के परिपाक से उत्पन्न आनन्दराशि मेरे अन्तःकरण को जैसे सन्तुष्ट कर रही है, चन्द्रमा क…
- Verse 7यों सोचकर विषयों से व्यावृत्त मन को फिर भी विश्रान्ति सुख के लिए लगा रहे बलि को चारों ओर…
- Verse 8उनके प्रणामो से बलि की दृष्टि आकुल हो गई | कुलाचलों के तुल्य विशाल शरीरवाले दत्यो से धिरे…
- Verse 9से ही बाह्य पदार्थो को देखने पर मन उनकी ओर आकृष्ट होने के कारण रागितारूप मल को प्राप्त हो…
- Verses 10–11यदि कोई शंका करे कि मोक्ष की इच्छा से समाधि ग्रहण में ही आपका आग्रह हो, तो उस पर कहते हैं…
- Verse 12ध्यान और अध्यान की भ्रान्ति का त्याग करके प्रत्यग्रूप आत्मतत्व अपने द्रष्टा स्वभाव से ही…
- Verse 13मैं न ध्यान की इच्छा करता हूँ और न ध्यान के अभाव की इच्छा करता हूँ। न भोगों की इच्छा करता…
- Verse 14न परमतत्त्व की मुझे अभिलाषा है और न जगत की स्थिति की मुझे वांछा है। न तो ध्यान दशा से मेर…
- Verses 15–17देह सम्बन्ध का अभाव होने से मैं मरा भी नहीं हूँ और प्राण का सम्बन्ध न होने से मैं जीवित भ…
- Verses 18–20यदि इस समय कर्तव्यत्व की आस्था से मेरा कुछ भी करणीय नहीं है, तो यह प्रस्तुत राज्यपालनरूप…
- Verses 21–23तदनन्तर बलि ने वहाँ पर ध्येय त्यागमय मन से सभी राजकार्य किये । ब्राह्मणों, देवताओं और गुर…
- Verses 24–26राजा बलि देवता, असुर आदि सब पर शासनरूप राज्य में राज्यांग आदि की अभिवृद्धि को प्राप्त हुआ…
- Verses 27–31सिद्धि देनेवाले भगवान श्रीहरि "बलि संसारी विविध भोगों का अभिलाषी नहीं है” ऐसा निर्णय कर ब…
- Verses 32–35पातालरूपी गर्त में स्थित जीवन्मुक्त गतिवाला बलि आपत्ति और सम्पत्ति को समान रूप से ही देखत…
- Verses 36–38हे श्रीरामचन्द्रजी, फिर इस बलि को सारे जगत का इन्द्ररूप से बहुत वर्षो तक शासन करना होगा ।…
- Verse 39अब बलि के चरित्र का उपसंहार कर श्रीरामचन्द्रजी को उपदेश देते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, बलि…
- Verses 40–41हे रघुवर, आप बलि के सदुश अपने विचार से “मे नित्य हूँ” इस प्रकार के निश्चय से पौरूषपूर्वक…
- Verse 42हे शत्रुतापन, इसलिए अन्त में अवश्य दुःखदायी सभी भोगों का त्यागकर आप सत्य आनन्दरूप दुःखरहि…
- Verses 43–44हे श्रीरामचन्द्रजी, विविध प्रकार की विकृतियों की सृष्टि करनेवाली इन दृश्य दृष्टियों को जै…
- Verse 45यदि कोई शंका करे कि शत्रु ओर मित्र में समद्रष्टि कैसे हो सकती है ? तो इस पर कहते है । आदि…
- Verse 46यदि श्रीरामचन्द्रजी को शंका हो कि मैं जीव हूँ, मेरी ईश्वरात्म समद्रष्टि कैसे हो सकती है,…
- Verse 47जैसे सूत में मणियाँ पिरोई होती हैं वैसे ही सदा प्रकाशमान शुद्ध- बुद्ध-ज्ञानरूप आपमें यह स…
- Verse 48कालकृत वैषम्य भी आप में नहीं है, यह कहते हैं। अज, पुरुषविराट्रूप आप शुद्ध चैतन्य ही हैं।…
- Verse 49तृष्णा बढ़ने पर जन्म आदि रोगों की प्रबलता ओर तृष्णा के कम होने पर जन्म आदि रोगों की दुर्ब…
- Verse 50आपके चैतन्य बल से ही यह जगत सिद्ध है, ऐसा कहते हैं। चिदादित्यरूप सदा प्रकाशमान जगत के अधि…
- Verse 51आप व्यर्थ विषाद मत करो, आपको सुख और दुःख की अभिलाषा नहीं है, आप शुद्धचित्त, सबके आत्मा और…
- Verse 52यदि आप अशुद्ध चित्त ही है, तो उसकी सिद्धि के लिए क्रम से उपाय सुनिये ऐसा कहते है। जो-जो व…
- Verse 53इष्ट और अनिष्टदुष्टि का त्याग करने पर अक्षय समता उत्पन्न होती हे । अभ्यास से हृदय में स्थ…
- Verses 54–55बालक की नाई जिन-जिन प्रदेशों में मन निमग्न होता है उन-उन प्रदेशों से लौटाकर मन को अधिष्ठा…
- Verse 56जो लोग शरीर को ही परमार्थ जानते हैं, मिथ्यादृष्टि से जिनका हृदय दूषित है ओर जो भोग संकल्प…
- Verse 57जो लोग पराधीन बुद्धि है, स्वय विचार नहीं कर सकते, उनका अज्ञान ही महाअनर्थ है, ऐसा कहते है…
- Verses 58–59हे महामते, आप हृदयरूपी आकाश में उदित हुए इस अविवेकरूपी मेघ को विवेकरूपी वायु से शीघ्र दूर…
- Verse 60वैराग्य, विचार, श्रवण आदि के रहते हुए भी बहिर्मुख दृष्टिवाले पुरुषों को ज्ञान नहीं होता,…
- Verse 61यदि कोई कहे, तब तो एकमात्र प्रत्यक्तत्त्वदृष्टि ही ज्ञान के लिए पर्याप्त हो, गुरु के उपदे…
- Verses 62–63विकल्प के अंश से रहित चैतन्यरूप सूर्य परमात्मा की यह विस्तृत व्याप्ति (देशतः, कालतः ओर वस…
- Verse 64हे मननशील श्रीरामचन्द्रजी, जब आप आत्मतत्त्व के आवरण और विक्षेप से रहित होंगे तब आप जो प्र…