Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verse 64
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
यदुपगच्छसि पासि निहंसि वा पिबसि विस्मयसे च विवर्धसे ।
तदपि तेन तदास्तु यदा मुने विगतबोधकलङ्कविशङ्कितः ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मननशील श्रीरामचन्द्रजी, जब आप आत्मतत्त्व के आवरण और
विक्षेप से रहित होंगे तब आप जो प्राप्त ही हैं ऐसे ज्ञान और ज्ञान के साधन (विचार, गुरु शास्त्रोपदेश
आदि का) मोक्ष के लिए जो स्वीकार करते हैं, जो विवेक वैराग्य आदि की यत्न से रक्षा करते हैं; जो
आलस्य, प्रमाद आदि दोषों पर यत्न से विजय प्राप्त करते हैं, जो समाधि सुखरूपी अमृत को पीते हैं,
जो उत्तरोत्तर भूमिका मेँ आरूढ होने से आश्चर्य करते है ओर जो सप्तम भूमिका में विश्रान्ति से पूर्व-
पूर्व अवस्था से अधिक सुख के उत्कर्ष से अभ्युदय को प्राप्त होते हैं, वह सब आपको न हो, किन्तु
ब्रह्मस्वरूप ही आप स्थित रहे