Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verses 18–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, verses 18–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 18-20
संस्कृत श्लोक
न किंचिदपि कर्तव्यं यदि नाम मयाधुना ।
तत्कस्मान्न करोमीदं किंचित्प्रकृतकर्म वै ॥ १८ ॥
इति निर्णीय पूर्णात्मा बलिर्ज्ञानवतां वरः ।
दैत्यानालोकयामास पद्मानीव दिवाकरः ॥ १९ ॥
दृष्टिपातविभागेन सर्वेषां दनुजन्मनाम् ।
शिरःप्रणामाञ्जग्राह पुष्पामोदानिवानिलः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि इस समय कर्तव्यत्व की आस्था से मेरा कुछ भी
करणीय नहीं है, तो यह प्रस्तुत राज्यपालनरूप कुछ कर्म मैं किसलिए न करूँ ? ज्ञानवानों में श्रेष्ठ
पूर्णात्मा बलि ने ऐसा निर्णय कर जैसे सूर्य कमलों को देखता है वैसे ही दैत्यों को देखा । यथायोग्य
दृष्टिपात कर दैत्यराज बलि ने जैसे वायु फूलों की सुगन्ध ग्रहण करता है वैसे ही सब दानवों के प्रणाम
ग्रहण किये