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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verses 15–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, verses 15–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 15-17

संस्कृत श्लोक

नाहं मृतो न जीवामि न सन्नासन्न सन्मयः । नेदं मे नैव चान्यन्मे नमो मह्यमहं बृहत् ॥ १५ ॥ इदमस्तु जगद्राज्यं तिष्ठाम्यत्र तु संस्थितः । नेह वास्तु जगद्राज्यं तिष्ठाम्यात्मनि शीतलः ॥ १६ ॥ किं मे ध्यानदृशा कार्यं किं राज्यविभवश्रिया । यदायाति तदायातु नाहं किंचन मे क्वचित् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

देह सम्बन्ध का अभाव होने से मैं मरा भी नहीं हूँ और प्राण का सम्बन्ध न होने से मैं जीवित भी नहीं हूँ। न मैं मूर्त हूँ, न अमूर्त हूँ और न मैं सन्मय हूँ। ये देह, लोक आदि मेरे नहीं हैं। अन्य देह और अन्य लोक आदि भी मेरे नहीं है । प्रत्यकृचैतन्रूप मुझको नमस्कार हे । मैं महान हूँ यह जगत साम्राज्य मेरा हो, इसमें स्थित होकर मैं बैठा हूँ अथवा यहाँ पर जगत साम्राज्य मेरा न हो, मैं सन्‍तापरहित हो आत्मा में स्थित हूँ। ध्यानदृष्टि से मेरा क्या काम है ? राज्य, वैभव-सम्पत्ति से मेरा क्या प्रयोजन है जो आता है, वह आये। न वह मैं हूँ और न वह मेरा है