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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verses 10–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

मोक्षमिच्छाम्यहं कस्माद्बद्धः केनास्मि वै पुरा । अबद्धो मोक्षमिच्छामि केयं बालविडम्बना ॥ १० ॥ न बन्धोस्ति न मोक्षोस्ति मौर्ख्यं मे क्षयमागतम् । किं मे ध्यानविलासेन किं वा ध्यानेन मे भवेत् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि मोक्ष की इच्छा से समाधि ग्रहण में ही आपका आग्रह हो, तो उस पर कहते हैं । मैं किससे मोक्ष की इच्छा करता हूँ ? पहले मैं बँधा ही किससे हूँ ? भाव यह कि ज्ञान से अज्ञान ओर अज्ञान के कार्य का त्रैकालिक बाध होने पर बन्ध का दर्शन ही नहीं है। बद्ध न होता हुआ भी मैं मोक्ष चाहता हूँ, यह मूर्खो की चेष्टा का अनुकरण नहीं तो और क्या है ? न मेरा बन्धन है, न मेरा मोक्ष हे । मेरे अज्ञान का विनाश हो चुका । ध्यान करने से ही मेरा क्या होगा अथवा ध्यान न करने से ही क्या होगा ?