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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verses 32–35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, verses 32–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 32-35

संस्कृत श्लोक

आविर्भावतिरोभावसहस्त्राणीह जीवताम् । तन्मनश्चिरमालोक्य भीमेषु विरतिं गतम् ॥ ३२ ॥ दशकोटीश्च वर्षाणामनुशास्य जगत्त्रयम् । अन्ते विरक्ततां प्राप्तमुपशान्तं बलेर्मनः ॥ ३३ ॥ ऊहापोहसहस्राणि भावाभावशतानि च । बलिना परिदृष्टानि क्व समाश्वासमेत्यसौ ॥ ३४ ॥ भोगाभिलाषं संत्यज्य बलिः संपूर्णमानसः । आत्मारामस्थितो नित्यं मध्ये पातालकोटरे ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

पातालरूपी गर्त में स्थित जीवन्मुक्त गतिवाला बलि आपत्ति और सम्पत्ति को समान रूप से ही देखता है। जैसे उदय और अस्त से रहित स्थिर किरणवाला चित्रलिखित सूर्यमण्डल न तो अस्त को प्राप्त होता है और न उदित होता है वैसे ही उसकी प्रज्ञा भी सुख और दुःख में न तो अस्त होती है और न उदित होती है ॥ ३०, ३ १॥ जीवन में आदर रखनेवाले भोगलंपट पुरुषों के विभव और जन्मों के हजारों बार आविर्भाव और तिरोभाव चिरकाल तक देखकर बलि का मन भोगों में वैराग्य को प्राप्त हो गया | दस करोड़ वर्ष तक लगातार तीनों लोकों का शासन करके अन्त में वैराग्य को प्राप्त हुआ बलि का मन शान्त हो गया | सुख ओर दुःखों के हजारों बार आगमन और विनाश सैकड़ों संपत्ति और विपत्तियाँ बलि ने देखी इसलिए कहाँ पर बलि आश्वासन को प्राप्त हो यानी किस विषय में बलि को आश्वासन मिले | परिपूर्ण चित्तवाला बलि भोगों में अभिलाषा का त्यागकर नित्य आत्मनिष्ठ होकर पाताल के मध्य में यानी रसातल में जबतक विपत्ति का क्षय नहीं होता, तब तक स्थित है