Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verses 21–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, verses 21–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 21-23
संस्कृत श्लोक
अथ वैरोचनिस्तत्र ध्येयत्यागमयात्मना ।
मनसा सकलान्येव राजकार्याणि संव्यधात् ॥ २१ ॥
द्विजान्देवान्गुरूंश्चैव पूजयामास पूजया ।
संमानयामास सुहृद्बन्धुसामन्तसज्जनान् ॥ २२ ॥
अर्थेनापूरयामास भृत्यानर्थिगणांस्तथा ।
ललना लालयामास विचित्रविभवार्पणैः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर बलि ने वहाँ पर ध्येय त्यागमय मन से सभी राजकार्य किये । ब्राह्मणों,
देवताओं और गुरूओं की पाद्य, अर्ध्य आदि से उसने पूजा की एवं मित्र, बन्धु, सामन्त ओर सज्जनों का
उनके उचित दान, समादर आदि द्वारा सम्मान किया नौकर-चाकर ओर याचकों को धन से परिपूर्ण
किया और भाँति-भाँति के विभवों के समर्पण द्वारा ललनाओं को प्रसन्न किया