Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verse 56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
मा शरीरयथार्थज्ञैर्मिथ्यादृष्टिहताशयैः ।
धूर्तैः संकल्पविक्रीतैर्विमूढैः समतां व्रज ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
जो लोग शरीर को ही परमार्थ जानते हैं, मिथ्यादृष्टि
से जिनका हृदय दूषित है ओर जो भोग संकल्पो के अधीन हैं, ऐसे धूर्त मूर्खं पुरुषों की समता को आप
प्राप्त न होइये