Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ वर्षसहस्रेण दिव्येनासुरपुङ्गवः ।
देवदुन्दुभिनिर्घोषैर्बुबुधे भगवान्बलिः ॥ १ ॥
बलौ प्रबुद्धे तद्बालं विरेजे नगरं तदा ।
वैरिञ्च इव सूर्यौघ उदिते कमलाकरः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, तदनन्तर पूरे एक हजार दिव्य वर्षो के बाद असुरश्रेष्ठ
महाऐश्वर्यशाली बलि देवताओं की दुन्दुभियों की तुमुल ध्वनि से समाधि से जागा । बलि के समाधि से
जागने पर उस समय वह बलि का नगर ब्रह्माजी के निवासभूत आकाश में सूर्य की किरणों के उदित
होने पर जैसे कमल का तालाब विकास शोभा से सुशोभित होता हे वैसे ही सुशोभित हुआ
सर्ग सन्दर्भ
अद्राईसर्वौँ सर्ग समाप्त उन्तीसवाँ सर्ग॑ जीवन्मुक्त बलि की राज्यसम्पत्ति ओर पाताल में बन्धन का वर्णन एवं श्रीरामचन्द्रजी के लिए बलि के समान पूर्णपद मेँ स्थिति का उपदेश ।