Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verse 57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
अकिंचनात्स्वनिर्णीतौ लम्बमानात्परोक्तिषु ।
न मौर्ख्यादधिको लोके कश्चिदस्तीह दुःखदः ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो लोग पराधीन बुद्धि है, स्वय विचार नहीं कर सकते, उनका अज्ञान ही महाअनर्थ है, ऐसा
कहते हैं ।
आत्मतत्त्व के निर्णय में विवेक वैराग्य आदि उपायों से दरिद्र, पर वंचक मूर्खो के कथन पर अवलम्बित
अज्ञान से बढ़कर इस लोक में अधिक दुःखदायी और कोई नहीं है