Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verses 43–44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, verses 43–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 43,44
संस्कृत श्लोक
इमा दृश्यदृशो राम नानाकारविकारदाः ।
नेह कान्ततया ज्ञेया दूराच्छैलशिला इव ॥ ४३ ॥
धावमानमिहामुत्र लुठितं लोकवृत्तिषु ।
संस्थापय निबद्ध्यैतच्चेतो हृदयकोटरे ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, विविध प्रकार की विकृतियों की सृष्टि करनेवाली इन दृश्य दृष्टियों को जैसे दूर
से पर्वत शिलाएँ रमणीय मालूम पडती हैं वैसे रमणीयरूप से नहीं जानना चाहिये । पामर पुरुषों के
व्यवहारो मे प्रवृत्त हुए इस लोक ओर परलोक में दौड रहे इस मन को बोधकर हृदयरूपी कोठरी में स्थिर
कीजिये