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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 18

सत्रहवाँ सर्ग समाप्त अट्टारहवाँ सर्ग॑ जिस स्थिति में स्थित पुरुष संसार में दुःखी नहीं होता, उस स्थिति का विस्तारपूर्वक श्रीरामचन्द्रजी के लिए उपदेश ।

45 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे आजानबाहु श्रीरामचन्द्रजी, समाहित चित्तवाले, काम, लोभ आदि कुदृष्ट…
  2. Verse 2जीवन्मुक्त मनवाला मुनि इस संसार में विचरण करते हुए भी पहले जन्मादि दुःखों से, बीच में आध्…
  3. Verses 3–6तत्‌-तत्‌ समय में प्राप्त हुए सब उचित कार्यों में स्थित, शत्रु, मित्र आदि दृष्टियों में स…
  4. Verse 7सब शत्रुओं मे सम दृष्टि रखनेवाला, दया, दाक्षिण्यआदि गुणों से युक्त, गुरु आदि पूजनीय लोगों…
  5. Verse 8जो पूछने पर प्रस्तुत विषय को कहता हैं, बिना पूछे मौन होकर खम्भ की तरह खड़ा रहता है, इच्छा…
  6. Verse 9सबका प्रिय करनेवाला, अगर कोई आक्षेप करे तो चतुरतापूर्वक समाधान करनेवाला ओर प्राणियों के आ…
  7. Verse 10यह युक्त है और यह अयुक्त है, इस प्रकार वैषम्य दृष्टि से ग्रस्त एवं आशय से जिसकी दृष्टि नष…
  8. Verse 11परम पद में आरूढ होकर वह विनाश को प्राप्त होनेवाली जगत की स्थिति को अन्तःशीतल अपनी बुद्धि…
  9. Verse 12हे श्रीरामचन्द्रजी, जिन लोगों ने अपने चित्त पर विजय प्राप्त कर ली है, जिन महात्माओं ने पर…
  10. Verses 13–15मुक्तो की स्थिति के समान बद्ध पुरुषों की स्थिति का उनके आशय के उद्धरण द्वारा आप वर्णन कीज…
  11. Verse 16यदि कोई कहे, इस प्रकार के धन से भी यज्ञादि सत्कर्म का आचरण होने से उनका निस्तार हो सकता ह…
  12. Verse 17इसलिए आप भी विद्रच्चरित्र से ही विहार कीजिये, अन्य से नहीं, ऐसा कहते है । हे श्रीरामचन्द्…
  13. Verse 18हे श्रीरामचन्द्रजी, भीतर सब आशाओं का त्याग कर वीतराग, वासनारहित हुए आप बाहर सब कर्म आचारो…
  14. Verse 19हे श्रीरामचन्द्रजी, उदार, मधुर आचारवाले, सबके (अज्ञानियों के भी ) कर्म आदि आचारो में अनुव…
  15. Verse 20हे श्रीरामचन्द्रजी, सब संसार दशाओं ओर परमार्थस्वरूप में स्थिति रूप भिन्न-भिन्न भूमिका दशा…
  16. Verse 21हे श्रीरामचन्द्रजी, भीतर निराशता का ग्रहण कर और बाहर आशान्वित पुरुषों की सी चेष्टावाले अत…
  17. Verse 22हे श्रीरामचन्द्रजी, बाहर कृत्रिम आडम्बरवाले ओर हृदय में आडम्बरहीन, बाहर कर्ता ओर भीतर अकर…
  18. Verses 23–24हे श्रीरामचन्द्रजी, अप सब पदार्थो का व्यवहारतः ओर परमार्थतः सारासार तारतम्य जान चुके हैं,…
  19. Verse 25हे श्रीरामचन्द्रजी, अहंकार का त्याग कर चुके, स्वस्थ बुद्धिवाले ओर आकाश के सदुश सुन्दर एवं…
  20. Verse 26हे राघव, सैकड़ों आशारूपी पाशों से उन्मुक्त, सब वृत्तियों में सम, बाहर तत्तत वर्णाश्रम स्व…
  21. Verse 27सब वृत्तियों में सम, ऐसा जो ऊपर कहा है, उसका बन्ध-मोक्ष आदि विषमता के प्रतिषेध द्वारा उपप…
  22. Verse 28हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे तेज धूप में जल की प्रतीति करानेवाला प्रचुर मृगजल भ्रमवश दिखाई दे…
  23. Verse 29देही का बन्धन क्यो नहीं है, ऐसा प्रश्न होने पर उसमे युक्ति दिखाते हैं। असंग, एकरूप, सर्वव…
  24. Verses 30–32यह विशाल संसार भ्रान्ति अतात्त्विक ज्ञान से उत्पन्न हुई है, तत्त्वज्ञान से यह जैसे रज्जु…
  25. Verse 33हे श्रीरामचन्द्रजी, आप अपनी एकाग्र सूक्ष्मबुद्धि से अपने तत्त्व को जान चुके हैं और अहंकार…
  26. Verse 34भोगों से, भोगसाधक बन्धुओं से, जगत के माला, चन्दन आदि पदार्थों से और उनकी प्राप्ति में निम…
  27. Verse 35हे श्रीरामचन्द्रजी, मैं, जिसका केवल आत्मता ही एकमात्र परमानन्दसत्य है, ऐसा हूँ, इस प्रकार…
  28. Verse 36मिथ्या होने के कारण बन्धु के उत्पन्न होने पर उसके दुःख-सुख के भ्रमो से आपका कौन सम्बन्ध ह…
  29. Verses 37–38इस प्रकार आत्मा के असंगत्व, अद्वितीयत्व के दर्शन से शोक को असम्भव कहा है । अब भले ही आत्म…
  30. Verse 39हे श्रीरामचन्द्रजी, पहले आप अन्य हुए थे, इस समय अन्य हैं और आगे भी अन्य होगे इस प्रकार क्…
  31. Verses 40–41तीसरे पक्ष में कहते हैं। पहले उत्पन्न होकर और इस समय उत्पन्न होकर फिर आप आगे नहीं उत्पन्न…
  32. Verses 42–43जबकि आत्मा के जन्म आदि का संगी होने पर भी शोक युक्त नहीं है, तब फिर असंग, उदासीन, नित्य,…
  33. Verses 44–47आप ही सवके अन्तरात्मा है, ऐसा कहते है। जिनका स्वरूप दृष्टिगोचर नहीं हुआ, ऐसे सूक्ष्म आप ह…
  34. Verses 48–49जो निस्तत्व हैं वह सत्यरूप से कैसे दिखाई देता है, ऐसी शंका होने पर कहते है । हे श्रीरामचन…
  35. Verse 50परस्पर निमित्तभूत ओर जर्जरित यह सारा जगत जल के तरगों के समूह के समान सदा बहता है
  36. Verse 51इस चंचल संसार का चक्र नेमि के (पहिये के घेरे के) समान चारों ओर से नीचे का भाग ऊपर आता है…
  37. Verses 52–53स्वर्ग के लोग नरक में जाते हैं और नारकीय लोग स्वर्ग मे जाते हैं । लोग एक योनि से दूसरी यो…
  38. Verse 54यह पदार्थ समूह एकरूप से स्थित, स्वच्छ और सन्तापरहित हे । जैसे अग्नि में हिमकण प्राप्त नही…
  39. Verses 55–56जो-जो महाभाम्यशाली बहुत-से बान्धव हैं, वे सब कुछ ही दिनों में नष्ट हुए ही देखने में आते ह…
  40. Verses 57–58हे श्रीरामचन्द्रजी, यह बन्धु है, यह शत्रु है, यह मैं हूँ, यह आप हे, इस प्रकार की आपकी मिथ…
  41. Verses 59–61हे सुव्रत श्रीरामचन्द्रजी, वासनाभारवान की यानी अज्ञानी की तरह जैसे आप श्रम से परिश्रान्त…
  42. Verse 62वह वस्तु नहीं है, जहाँ पर मैं नहीं हू । वह वस्तु नहीं हे, जो मेरी न हो, ऐसा निश्चय कर धीर…
  43. Verse 63जो पुरुष महान है, वह चिदाकाश के समान न तो अस्त को प्राप्त होता है ओर न उदित होता हे, जैसे…
  44. Verse 64हे श्रीरामचन्द्रजी, सभी भूतजातियाँ आपके बन्धु सम्बन्धी हैं, क्योंकि अनादि संसार में सब यो…
  45. Verse 65जहाँ विविध योनियों से विचित्र सैकड़ों जन्मों से यह भ्रम निहित है, ऐसे इस जगत में यह बन्धु…