Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verses 52–53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, verses 52–53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 52,53
संस्कृत श्लोक
स्वर्गस्था नरकं यान्ति नारकाश्च त्रिविष्टपम् ।
योनेर्योन्यन्तरं यान्ति द्वीपाद्द्वीपान्तरं जनाः ॥ ५२ ॥
धीराः कार्पण्यमायान्ति कृपणा यान्ति धीरताम् ।
परिस्फुरन्ति भूतानि पातोत्पातशतभ्रमैः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वर्ग के लोग नरक में जाते हैं और नारकीय लोग स्वर्ग मे जाते हैं । लोग एक योनि से दूसरी योनि में और
एक द्वीप से दूसरे द्वीप में जाते हैँ । धीर लोग दीनता को प्राप्त होते हैं और दीन धीरता को प्राप्त होते हैं ।
अधोगति, ऊर्ध्वगति आदि सैकड़ों भ्रमों से प्राण परिस्फुरित होते हैं