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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

नाभिनन्दति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । मौनस्थः प्रकृतारम्भी संसारे नावसीदति ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

सब शत्रुओं मे सम दृष्टि रखनेवाला, दया, दाक्षिण्यआदि गुणों से युक्त, गुरु आदि पूजनीय लोगों के समयोचित सेवा, परिपालन आदि कार्य करनेवाला पुरुष संसार में दुःखी नहीं होता। जो पुरुष प्राप्त प्रिय का न अभिनन्दन करता है, न अप्रिय का द्वेष करता है, न विनष्ट का शोक करता है, न अप्राप्त की आकांक्षा करता हे, मितभाषण करता हे और आवश्यक काम में आलस्य नहीं करता है, वह संसार में पीडित नहीं होता