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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verses 48–49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, verses 48–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 48 ,49

संस्कृत श्लोक

सर्वशक्तेरियं शक्तिर्भ्रममात्रमयं तथा । राम दृश्यत एवेदमाभानमतिभास्वरम् ॥ ४८ ॥ सुबन्धुः कस्यचित्कः स्यादिह नो कश्चिदप्यरिः । सदा सर्वे च सर्वस्य सर्वं सर्वेश्वरेच्छया ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

जो निस्तत्व हैं वह सत्यरूप से कैसे दिखाई देता है, ऐसी शंका होने पर कहते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, सर्वशक्ति की यह शक्ति है, जो कि भ्रममात्रतामय यह जगदाकार भान अतिस्फुट दिखाई देता है (जगत की भ्रममात्रता के प्रदर्शन के लिए उसकी अनित्य स्वभावता दिखलाते है) यहाँ पर कोई किसी का सुबन्धु नहीं हे, कोई किसीका शत्रु भी नहीं है, सर्वेश्वर भगवान्‌ की इच्छा से सब- सबके-सब (शत्रु, मित्र ओर उदासीन) होते हैं