Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verses 57–58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, verses 57–58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 57,58
संस्कृत श्लोक
अयं बन्धुः परश्चायमयं चाहमयं भवान् ।
इति मिथ्यादृशो राम विगलन्तु तवाधुना ॥ ५७ ॥
क्रीडार्थं व्यवहारस्थ एताभिर्हतदृष्टिभिः ।
आमूलमन्तश्छिन्नाभिर्बहिर्विहर हेलया ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, यह बन्धु है, यह शत्रु है, यह मैं हूँ, यह आप हे, इस
प्रकार की आपकी मिथ्यादुष्टर्यो अब छिन्न -भिन्न हो जाय । क्रीडा के लिए व्यवहार में स्थित आप
भीतर अज्ञान और वासना के साथ छिन्न-भिन््न हुई, बाधित अनुवृत्तिवाली इन दृष्टियों से आनन्दपूर्वक
बाहर व्यवहार कीजिये