Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
न बन्धोऽस्ति न मोक्षोऽस्ति देहिनः परमार्थतः ।
मिथ्येयमिन्द्रजालश्रीः संसारपरिवर्तिनी ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
सब वृत्तियों में सम, ऐसा जो ऊपर कहा है, उसका बन्ध-मोक्ष आदि विषमता के प्रतिषेध द्वारा
उपपादन करते हैं।
देही का परमार्थतः न बन्ध है और न मोक्ष है। यह मिथ्या इन्द्रजाल के संसार में भ्रमण करानेवाली
है