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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verses 30–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, verses 30–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

अतत्त्वज्ञानजातेयं संसारभ्रान्तिरातता । तत्त्वज्ञानात्क्षयं याति रज्ज्वामिव भुजङ्गधीः ॥ ३० ॥ ज्ञातवानसि तत्त्वं स्वमेकया सूक्ष्मया धिया । जातोऽसि निरहंकारो व्योमवत्तिष्ठ निर्मलः ॥ ३१ ॥ ज्ञोऽसि त्वित्थं तदखिलाः सुहृद्बान्धववासनाः । संत्यजासत्स्वभावस्य का नाम किल भावना ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

यह विशाल संसार भ्रान्ति अतात्त्विक ज्ञान से उत्पन्न हुई है, तत्त्वज्ञान से यह जैसे रज्जु में सर्पबुद्धि चली जाती है वैसे ही नष्ट हो जाती है