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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

अपि चेत्थं तदन्यस्त्वं सत्त्ववाननुमीयसे । इदं प्रथमतः प्राप्तं परमादपि कारणात् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, आप अपनी एकाग्र सूक्ष्मबुद्धि से अपने तत्त्व को जान चुके हैं और अहंकाररहित हो चुके हैं, इसलिए आप आकाश के तुल्य निर्मल होकर स्थित होइये। आप इसी प्रकार साक्षी है, इसलिए मित्र, बन्धु, बान्धवों से सम्बन्ध रखनेवाली सब वासनाओं का त्याग कीजिये । जिनका स्वरूप ही विद्यमान नहीं हैं ऐसे बन्धु-बान्धवों की वासना कैसी ? ॥ ३ १,३ २॥ इस प्रकार वासना का त्याग होने पर वासनाओं से परिशिष्ट साक्षीरूप आपका परिशेषतः परमार्थसत्त्ववान्रूप से अनुमान होता है । वासनाओं के त्याग के पहले परम कारण ब्रह्म से प्रलय ओर सुषुप्ति में नित्य प्राप्त हुआ भी यह आत्मतत्व परिच्छिन्न, असत्यरूप ही प्राप्त हुआ; किन्तु परमार्थसत्यरूप प्राप्त नहीं हुआ। इस प्रकार वासना त्याग ही आत्म प्राप्ति में हेतु है, अन्य हेतु नहीं है, यह भाव है