Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verses 3–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, verses 3–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 3-6
संस्कृत श्लोक
सर्वप्रकृतकार्यस्थो मध्यस्थः सर्वदृष्टिषु ।
ध्येयं तं वासनात्यागमवलम्ब्य व्यवस्थितः ॥ ३ ॥
सर्वत्र विगतोद्वेगः सर्वार्थपरिपोषकः ।
विवेकोद्द्योतदृष्टात्मा प्रबोधोपवनस्थितिः ॥ ४ ॥
सर्वातीतपदालम्बी पूर्णेन्दुशिशिराशयः ।
नोद्वेगी नच तुष्टात्मा संसारे नावसीदति ॥ ५ ॥
सर्वशत्रुषु मध्यस्थो दयादाक्षिण्यसंयुतः ।
प्राप्तकर्मकरोऽग्र्याणां संसारे नावसीदति ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्-तत् समय में प्राप्त हुए सब उचित कार्यों में
स्थित, शत्रु, मित्र आदि दृष्टियों में सम, पूर्वोक्त ज्ञेय और ध्येय भेद से वर्णित दो प्रकार के वासना
त्यागों में से ध्येय वासनात्याग का अवलम्बन करके स्थित, सर्वत्र उद्रेगरहित, लोगों के अभिमत का
पोषक यानी किसीका भी अप्रिय न करनेवाले, विवेकरूपी प्रकाश से आत्मसाक्षात्कारवान्, ज्ञानरूप
उपवन में स्थित, सर्वातीत पद का यानी ब्रह्म का अवलम्बन करनेवाला, पूर्णचन्द्रमा के समान शीतल
आशयवाला, न किसी से उद्वेग करनेवाला और न किसी से सन्तुष्ट होनेवाला पुरुष संसार में दुःखी
नहीं होता