Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 53
बावनवाँ सर्ग समाप्त तिरपनवाँ सर्ग जगत संकल्प से कल्पित है, इस अर्थ में दृष्टान्तभूत खोत्थ राजा के उपाख्यान के तात्पर्य का विस्तारपूर्वक वर्णन ।
39 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, वहाँ जम्बूद्रीप में अर्धरात्र के समय कदम्ब वृक्…
- Verse 2हे तात, खोत्थनाम से प्रख्यात उत्तम आकृतिवाला कौन-सा वह राजा है ? आपने मुझसे यह क्या कहा ?…
- Verse 3विरुद्ध होने के कारण आपका वचन मेरे मोह के लिए हो रहा हे
- Verse 4दाशूर ने कहा : हे पुत्र, सुनो, यथार्थ यह मैं तुमसे कहता हूँ, जिससे तुम इस संसारचक्र के तत…
- Verse 5परमार्थसत्ताशून्य अज्ञान से उत्पन्न अतएव मायामय विस्तृत इस संसार की इस स्थिति का मैंने इस…
- Verse 6परमाकाश से उत्पन्न हुआ संकल्प खोत्थ कहा जाता है, वह अपने संकल्प से उत्पन्न प्रवृत्ति की व…
- Verse 7यह विशाल सारा जगत उसका परिणाम है, क्योंकि संकल्प के उत्पन्न होने पर उत्पन्न होता है और सं…
- Verse 8यदि कोई शंका करे ब्रह्मा, विष्णु आदि से जगत की उत्पत्ति हुई है, ऐसा सुना जाता है, फिर कैस…
- Verses 9–11तीनों कालों में जगत के अभाव से युक्त ब्रह्म में उसने इस त्रिजगतरूपी घर को बना रक्खा है अच…
- Verse 12जहाँ पर सूर्य की किरणों से चमकती हुई चंचल तरंग ही बड़ी- बड़ी मुक्ता है, जहाँ पर ओस की सुन…
- Verse 13जहाँ पर ईख के रस, दूध आदिरूप जलवाले, मणि, रत्नरूपी भसींड़े के अंकुरों से युक्त, बड़वानलरू…
- Verse 14*ऊर्ध्वाधोगतिरूपेण वाणिमार्गेण संकुलम्” (शास्त्रीय कर्मो से ऊर्ध्वगति होती है, अशास्त्री…
- Verses 15–16पूर्वोक्त इसी त्रिजगद्रूपी नगर में संकल्परूपी राजा ने अपनी क्रीड़ा के लिए भाँति-भाँति के…
- Verses 17–19उसने प्राणों के प्रवाह से चल रहे, मांसरूपी मिट्टी के बने हुए, सफेद अस्थिरुपी लकड़ीवाले, त…
- Verse 20कान, नासिका, मुख, तालू, आदि बहुत-सी खिडकियो से वे युक्त है, भुजा आदि अंगरूपी सड़कों से वे…
- Verse 21हे महामते, उन देहरूपी मध्यगृहों मे संकल्प ने माया से अहंकाररूपी महायक्षो की रचना रच रक्खी…
- Verse 22देहरूपी मध्यगृहों के अन्दर अहंकाररूपी महायक्ष, जो कि माया से उत्पन्न हुए हैं उनके साथ वह…
- Verse 23यदि कोई कहे कि देह ही अहंकार है, अन्य अहंकार नहीं है, तो इस पर नहीं, ऐसा कहते हैं। जैसे क…
- Verse 24जैसे सागर में तरंग क्षणभर में उदित होती है और क्षण भर में विलीन हो जाती है, वैसे ही देहरू…
- Verse 25तस्येच्छा जायते“ इत्यादि के तात्पर्य का पुत्र द्वारा उक्त विरोध के परिहार से वर्णन करते ह…
- Verse 26तेनाऽऽशु स विनश्यति“ इसके तात्पर्य को कहते हैं। अनेक करोड़ों जन्मों में दु:ख का अनुभव करक…
- Verse 27पुनरुत्पद्यते' इसका तात्पर्य कहते हैं । बालक के द्वारा कल्पित यक्ष के समान संकल्पमात्र स्…
- Verse 28जैसे घन अन्धकार अपनी सत्ता से अंधत्व का विस्तार करता है और अपनी असत्ता से उसका विनाश करता…
- Verse 29*किंकरोऽर्म्यहमज्ञोऽस्मि“ इत्यादि शोकोक्ति का तात्पर्य कहते हैं। काष्ठ के बीच में जिसके अ…
- Verse 30जैसे गदहा अकस्मात गिरे हुए शहद की बूँदों का स्वाद लेता है, वैसे ही आनन्द लेश का संकल्प कर…
- Verse 31बालक के समान संकल्प से ही वह स्वयं एक क्षण में विरक्त होता है, क्षण भर में स्वयं अनुराग क…
- Verses 32–33खोत्थ की आख्यायिका के वर्णन का प्रयोजन कहते हैं। हे पुत्र, बुद्धि इस संकल्प को सब बाह्य व…
- Verse 34पहले सर्ग में जो तीन शरीर कहे गए थे, उन्हीका विस्तार करते हैं। उस संकल्पात्मक मन के सत्व,…
- Verse 35सत्त्वरूप संकल्प धर्म और ज्ञान में परायण होकर स्वराज्य को (हिरण्यगर्भ भावपर्यन्त देवताभाव…
- Verses 36–38रजोरुप संकल्प मनुष्यरूप जन्म से मनुष्योचित व्यवहारवाला होता है, वह संसार में पुत्र, स्त्र…
- Verses 39–42हे महामते, तीन प्रकार के इस स्वरूप को त्याग कर संकल्प: आत्यन्तिक संकल्पोच्छेद होने पर मोक…
- Verse 43वह संकल्प की निवृत्ति ब्रह्मस्वरूप ही है, इस आशय से कहते हैं। बाधरहित, अविकारी, परमपवित्र…
- Verse 44यदि कोई शंका करे कि एकमात्र संकल्प के नष्ट होने पर संपूर्ण जगद्रूप बन्धन की निवृत्ति कैसे…
- Verse 45यदि कोई शंका करे कि यह संकल्प आदि सव भावों की निवृत्ति असत् है या सत् है या सदसत् है ।…
- Verse 46जिस-जिसका जैसा संकल्प किया जाता है, वह क्षण भर में वैसा हो जाता है, इसलिए हे तत्त्वज्ञ, त…
- Verse 47संकल्प से रहित हुए तुम जो व्यवहार जैसे प्राप्त हो, वैसे उसमें तत्पर होओ, क्योकि संकल्प का…
- Verse 48मोक्ष का सम्पादन यदि न किया जाय, तो क्या क्षति है, ऐसा यदि कोई कहे, तो उस पर कहते हैं। सत…
- Verse 49हे निष्पाप, नाना योनियों में जन्म के लिए दुःखार्थं पुनः पुनः उस मरण से तुम्हें क्या लाभ ह…
- Verse 50तो मुझे क्या करना चाहिए, यदि ऐसा पुत्र की ओर से प्रश्न हो, तो उस पर कहते हैँ । सुषुप्त चि…