Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verses 17–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, verses 17–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 17-19
संस्कृत श्लोक
वातयन्त्रप्रवाहेण चलन्तो मांसमृन्मयाः ।
सितास्थिदारवश्चित्रास्त्वग्लेपमसृणामलाः ॥ १७ ॥
केचिच्चिरेण नश्यन्ति केचिच्छीघ्रविनाशिनः ।
केचित्केशोलपोल्लासरचिताच्छादनश्रियः ॥ १८ ॥
कर्णाक्षिनासाप्रमुखैर्द्वारैर्नवभिरन्विताः ।
अनारतवहत्प्राणपवनेनोष्णशीतलाः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
उसने प्राणों के प्रवाह से
चल रहे, मांसरूपी मिट्टी के बने हुए, सफेद अस्थिरुपी लकड़ीवाले, तेल, उबटन आदि से चिकने और
निर्मल विविध प्रकार के जीव बनाए है । कोई चिरकाल में नष्ट होते हे । कोई शीघ्र नष्ट होनेवाले हैं,
(&) मनुष्य और देवताओं के "देवान् भावयताऽनेन ते देवा भावयन्तु वः” इस भगवद्वाक्य से
पुण्य और उसके फल से क्रय-विक्रय होते हैं । म्लेच्छों के, जो कर्माधिकार से बहिष्कृत हैं, पाप और
उसके फल स्थावर, तिर्यगादि योनियों से क्रय-विक्रय होते हैं ।
किन्हींकी केशरूपी तृणों की वृद्धि से आच्छादन शोभा बनाई गई है । कान आँख, नासिका आदि नौ
द्वारों से युक्त हें । निरन्तर बह रहे प्राणवायु से वे उष्ण ओर शीतल हैं