Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
स्वयं संकल्पनामात्रं जायते बालयक्षवत् ।
अनन्तायात्मदुःखाय नानन्दाय कदाचन ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
पुनरुत्पद्यते' इसका तात्पर्य कहते हैं ।
बालक के द्वारा कल्पित यक्ष के समान संकल्पमात्र स्वरूप वह स्वयं अनन्त आत्मदु:खों के लिए
उत्पन्न होता है, आनन्द के लिए कभी उत्पन्न नहीं होता