Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
संकल्प्यते यथा यद्यत्तत्तथा भवति क्षणात् ।
मा किंचिदपि तत्त्वज्ञ संकल्पय कदाचन ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस-जिसका जैसा संकल्प किया जाता है, वह क्षण भर में वैसा हो जाता है, इसलिए हे तत्त्वज्ञ,
तुम कभी भी किसी भी वस्तु का संकल्प मत करो