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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verse 45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

असत्सत्सदसत्सर्व संकल्पादेव नान्यतः । संकल्पं सदसच्चैवमिह सत्यं किमुच्यताम् ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि यह संकल्प आदि सव भावों की निवृत्ति असत्‌ है या सत्‌ है या सदसत्‌ है । यदि असत्‌ है, तो मोक्ष की अस्रिद्धि हो जायेगी । यदि सत्‌ है, तो मोक्ष होने पर भी द्वैत की आपत्ति हो जायेगी । यदि सदसत्‌ है, तो बन्ध और द्वैत की पाक्षिक अनुवृत्ति होगी, इसलिए मोक्ष में अक्षुण्णता की सिद्धि नहीं होगी, इत्यादि दोषों का एक उक्ति से परिहार करते हैं। असत्‌, सत्‌, सदसत्‌-सब विकल्प संकल्प से ही पदार्थों के साथ उत्पन्न हुए हैं, वे संकल्प का ही सदसद्रूप से विकल्प करने के लिए समर्थ नहीं है । परमार्थ सत्यसंकल्प ब्रह्म का वे स्पर्श भी नहीं कर सकते, इसमें कहना ही क्या है ? कार्य जहाँ पर अपने से सम्बन्ध रखनेवाले आन्तर कारण में भी कुण्ठित होते हैं | वहाँ पर असंग परमात्मा में तो उनके कुण्ठीभाव का क्या कहना है ?