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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

इदं स्फारं जगद्दुःखं प्रतनोत्यात्मसत्तया । असत्तया नाशयति घनमान्ध्यं यथा तमः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे घन अन्धकार अपनी सत्ता से अंधत्व का विस्तार करता है और अपनी असत्ता से उसका विनाश करता है वैसे ही संकल्प अपनी सत्ता से ही विशाल जगद्‌ दुःख का विस्तार करता है और अपनी असत्ता से उसका विनाश करता है