Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
स्वयैव दुःखदायिन्या चेष्टया परिरोदिति ।
काष्ठावष्टब्धवृषणः कीलोत्पाटी कपिर्यथा ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
*किंकरोऽर्म्यहमज्ञोऽस्मि“ इत्यादि शोकोक्ति का तात्पर्य कहते हैं।
काष्ठ के बीच में जिसके अण्डकोश दब गये, उस कील उखाड़नेवाले बन्दर के समान दुःख
देनेवाली अपनी करनी से ही वह रोता है